ऐसे ही कुछ ख़याल – सुरभि दीवान


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दो हज़ार बीस। ये साल ख़त्म होने को आया है लेकिन ऐसा लगता है जैसे इस साल कुछ हुआ ही नहीं। सच तो यह है कि जो इस साल हुआ है उसका असर बहुत सालों तक रहने वाला है। मुझे अभी भी यकीन नहीं होता कि कैसे मार्च के महीनों में पूरी दुनिया रुक गयी थी। पूरी दुनिया। एक साथ, रुक गई। हम सब अपने घरों में बंद हो गए।

मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं आया। मैं घर से ही काम करती हूँ तो बाहर से देखने पर कुछ अलग नहीं लग रहा था। लेकिन अंदर से सब कुछ बदल रहा था। कुछ नए सवाल खड़े हो रहे थे, और अपने बारे में बहुत कुछ नया दिखाई दे रहा था।

जैसे ‘कोरोना वायरस’, ‘लॉकडाउन’ और ‘पेंडेमिक’ जैसे शब्द हमारे मामूली ज़िंदगी का एक अहम् हिस्सा बन रहे थे, वैसे ही ‘एसेंशियल वर्कर’ जैसे शब्द ने मुझे सोच में डाल दिया। एक डॉक्टर से लेकर सब्ज़ी बेचने वाले तक, एक बैंक इम्प्लॉई और न्यूज़ रिपोर्टर, मेडिकल शॉप चलाने वाले, अंडा-ब्रेड-दूध बेचने वाले, हमारी बिल्डिंग के सेक्यूरिटी गार्ड- ये सब ‘एसेंशियल वर्कर’ हैं। और मैं कौन?

इससे पहले मैंने दुनिया को इस नज़रिए से कभी नहीं देखा था। इस साल, हम सब एक बार फिर दो हिस्सों में बँट गए थे- एक दूसरे से बिलकुल ही अलग – ‘एसेंशियल’ और ‘नॉन-एसेंशियल’।

जब चीन, इटली और अमेरिका में ये बीमारी बुरी तरह से फैल रही थी, मुझे ऐसा लगा था कि इस बार तो हम न्यूज़ देख कर ये नहीं कह पाएंगे की “ये कोई और लोग हैं”, या “ये किसी और दुनिया की ख़बर है”, या “इससे हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता”। इस बार तो कुछ ऐसी हालत थी कि हमको एक दूसरे को समझने से कोई रोक ही नहीं सकता। मुझे ऐसा लगा कि जैसे मेरे ख़्वाबों की दुनिया एकदम से मेरी आँखों के सामने आ गई हो – ऐसी दुनिया जो इंसानियत के नाते जुड़ी हो। मुझे लगा कि इस दुःख में, डर में, दर्द में, हम एक दूसरे का साथ ज़रूर देंगे। अफ़सोस की बात है कि ऐसा हुआ नहीं। राजनीति एक बार फिर जीत गई; सरहदें और मज़बूत हो गईं। दिल और कमज़ोर हो गए; इंसानियत एक बार फिर हार गई।

लॉकडाउन शुरू होते ही सड़कें खाली हो गई थी, और कुछ ही दिनों में हवा साफ़। आसमान का रंग बदल गया था – इतना साफ़ और नीला जैसे अब से तीस साल पहले होता था। रात को तारें दिखने लगे थे! ऐसा लग रहा था जैसे कि पेड़, पौधे और चिड़ियाँ पहली बार सांस ले रहे हैं। रोज़ अलग चिड़ियों की आवाज़ आनी शुरु हुई जो वैसे शायद गाड़ियों के शोर में छिप जाती होगी। ऐसा ही कुछ मेरे अंदर भी हो रहा था – बहुत से ख़याल सामने आने लगे जो पहले ज़िंदगी के शोर में सुनाई नहीं देते थे। मेरे दिन और मेरी रातें, सूरज और चाँद के साथ-साथ चलने लगी थी। ऐसा लगा की ज़िंदगी ऐसे ही गुज़रती अगर दुनियादारी का शोर न होता।

कुछ और वक़्त बाद ऐसा लगने लगा जैसे लॉकडाउन में ज़िंदगी के सारे नियम गायब हो गए हों – वो नियम जिनके बारे में हम सोचते भी नहीं हैं, बस भीड़ के पीछे चलते रहते हैं। ऐसा लगा जैसे ये बहुत ही क़ीमती वक़्त है। कुछ नया करने का ऐसा मौका शायद कभी न मिलें। मेरे अंदर वो आवाज़ जो कुछ भी नया करने से रोकती है, डराती रहती है, वो आवाज़ कमज़ोर हो गई थी- जैसे कि इस अजीब वक़्त में क्या जायज़ है क्या नहीं ये उसे समझ नहीं आ रहा। पहली बार ऐसा लग रहा था जैसे दुनिया के पीछे भागने की ज़रुरत नहीं है। अभी के लिए सबने भागना छोड़ दिया है। चाहे बस अभी के लिए ही- मैंने अपने से कहा- “बिना डरे, जो करना है करो।” इस सोच ने मुझे अपने ही हाथों से बुने हुए जाल से सामना कराया, और इस जाल से आज़ादी मिलने पर कैसा लगता है, उसकी एक झलक दिखाई। तब से अब तक मैं उसी आज़ादी की तलाश में हूँ।

साल ख़त्म होने वाला है, बीमारी कहीं गयी नहीं है; बस हम सबने मान लिया है कि हम ज़िंदगी को रुकने नहीं देंगे। सड़कों पर फिर से गाड़ियों का शोर, बाज़ारों में लोगों की भीड़, चिड़ियों की ख़ामोशी- सब कुछ वापस आ गया है। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। हम इतनी जल्दी भूल गए कि हमारी लापरवाही से दूसरों की ज़िंदगी को खतरा है, कि हम सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। लेकिन हमारा सब्र ख़तम हो रहा है। और ज़िंदगी की कीमत सस्ती। बस ऐसे ही कुछ ख़याल आते हैं आजकल।

[Transcription in Hindi by Sumati Panikkar]

As the virus spread like wildfire, in China, Italy and America, I thought that at least this once we (in India) won’t be able to watch the news and say this is about someone else or some other place.

Surbhi Dewan
Just Some Thoughts

Translation from the Hindi by Surbhi Dewan:

Just Some Thoughts by Surbhi Dewan

Two thousand and twenty. As the year comes to an end, it feels like not much was accomplished. And yet, this year will stay with us for many years to come. I still can’t believe how in March, the whole world came to a standstill. The whole world frozen in time, as all of us retreated into our homes together.

Not much changed in my daily life. Working from home is not unusual for me, so my days looked the same from the outside. But inside, a seismic shift was taking place. Some new questions and personal realities began to emerge.

As words like ‘coronavirus,’ ‘lockdown’ and ‘pandemic’ entered our daily vocabulary, the term ‘essential worker’ got me thinking. How is it that a doctor, a vegetable vendor on the street, a bank employee, a news reporter, a medical store worker, the guy around the corner selling bread, eggs and milk, and even the security guard outside my apartment are all ‘essential workers. What about me?

I had never seen the world through this lens. This year, we all came to be divided by a new line drawn between us – separated into two microcosms of human experience – ‘essential’ and ‘non-essential.’

As the virus spread like wildfire, in China, Italy and America, I thought that at least this once we (in India) won’t be able to watch the news and say this is about someone else or some other place. This does not affect us. I thought that this time around, no one could stop us from empathizing with the other. I felt like my utopian world had come to life – a world connected closely through our humanity. I felt that in this time of profound grief, crippling fear and unimaginable pain, we would definitely offer support to one another. Unfortunately, this did not happen. Yet again, politics won. Yet again, borders hardened. Yet again, hearts faltered. Yet again, humanity lost.

As soon as the lockdown began, streets became empty and the air clean. The colour of the sky became so clear, as clear as it used to be thirty years ago. Many more stars became visible at night. It seemed like the trees, plants and birds were all breathing for the first time. Every day the chirping of new birds became audible – sounds that had for so long been hidden behind the traffic noise. Something similar was unfolding inside of me – many thoughts started surfacing. They had been hidden for so long behind the noise of life. I began to fall into a natural rhythm, in line with the rhythms of the sun and the moon. It felt like this was how life was supposed to be lived, in the absence of worldly distractions.

As the lockdown continued, it felt like all the rules of living began to fade away, the rules that I had been following mindlessly because “that is what one is supposed to do.” It felt like this was an opportune moment to try new things. I might never get a chance like this again. That voice inside me, the one that stops me from doing new things, the one that is full of fears, that voice had become feeble – as if it had become confused about its own logic.

For the first time it felt like there was no need to run behind the rest of the world. For the time being, everyone had stopped running. For now, I told myself, “Do what you want without trepidation.”

These thoughts made me confront the intricately woven web of fears I have always been enmeshed in. And even if just for a moment, I saw a glimpse of the freedom that lay on the other side of this web.

I have been in search of that freedom ever since.

The year is coming to an end, while the virus is still with us. We seem to have decided that we will not let it stop us from living. Noise in the streets has returned, people throng marketplaces once again, birds have gone silent, everything is back to ‘normal’. As if nothing happened. How easily we forget that our carelessness endangers the lives of others, that we are all connected, and depend on one another.

But we have run out of patience, and the value of life has cheapened.

These are just some of the thoughts that visit me these days.

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